गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

इलाहाबाद नगरी

साथियों ,





काफी समय के बाद  आपके बिच आया इसके  लिए  माफ़ी मागता हूँ /

वीर बजरंगी को मेरा संगम तट इतना भाया कि वह यहीं लेट गए। पूरा देश घूम आइए, हनुमानजी कहीं लेटे हुए नहीं मिलेंगे, लेकिन मैंने हनुमान का मिजाज भी बदल दिया। किसी और शहर में कहां ऐसा सम्मोहन, जो मेरे में है।
ऐतिहासिक स्वराज भवन, आनंद भवन, चंद्रशेखर आजाद पार्क, खुसरो बाग, चौक में नीम के पेड़ को सहेजे हुए मैं स्वतंत्रता संग्राम का मूक गवाह हूं, तो इलाहाबाद केंद्रीय विश्‌र्र्वविद्यालय, मोती लाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, ट्रिपलआइटी, सैम हिंगिनबॉटम इंस्टीट्यूट ऑफ एर्ग्रीकल्चर एंड साइंसेज (शियाट्स), झूंसी स्थित गोविंद वल्लभ पंत संस्थान के रूप में आधुनिक भारत की तस्वीर पेश करता हूं।
सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन से लेकर अमरकांत, शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह तक साहित्यकारों की बड़ी टोली मेरे ही गोद में बढ़ी-गढ़ी है। मुझे अपने इन सुपूतों पर नाज है। इन्ही की बदौलत तो मैं केवल गंगा, यमुना व सरस्वती का संगम नहीं हूं, बल्कि कला, साहित्य, धर्म-अध्यात्म की त्रिवेणी भी हूं।
कहते हैं कि जहां आधुनिकता आती है, वहां परंपराएं, पुराने प्रतिमान कुछ बिगड़ते हैं। मेरे साथ ऐसा ही हुआ। शहर ने समय के साथ काफी तरक्की की। इसी के साथ दूषित होती गईं मेरी जीवन रेखाएं गंगा व यमुना। सरस्वती तो बहुत पहले ही विलुप्त हो गई। गंगा-यमुना शेष बची हैं, इन्हें लुप्त होने से बचाने की चुनौती इलाहाबादियों के कंधे पर भी है। यह आप सबके लिए जरूरी है। कहते हैं कि जिन मानव सभ्यताओं ने नदियों का जीवन नहीं बचाया, उनका खुद का अस्तित्व खत्म हो गया। गंगा-यमुना आज प्रदूषण से कराह रही हैं। किसी को चिंता नहीं है। वह तो धन्य हो इलाहाबाद हाईकोर्ट। उसने मेरी इस पीड़ा को महसूस किया। सरकार को फटकारा, लेकिन इसके लिए आप सबका सहयोग जरूरी है। कुछ ही महीने बाद कुंभ मेला लगने वाला है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां आएंगे। वे मेरा यह हाल देखेंगे, तो क्या कहेंगे? कोई कुछ कहे। यह अच्छा नहीं।

KARMA YOG

हमें सत्यनिष्ठ बनना है। हमारा स्वरूप यही है। असत्य और अज्ञान तो हमने स्वयं ओढ़ रखा है और इसी कारण से हम दुर्बल हो गए हैं। सतत संघर्ष ही जीवन पथ का पाथेय है। जो संघर्ष से डरते हैं वे ही कमजोर होते हैं। संघर्ष का पथ अपनाने वाले हमेशा वीर होते हैं और विजयी होते हैं। जीवन का कष्ट भागने से नहीं, सामना करने से भाग जाता है। इसके लिए आत्मशक्ति की पहचान आवश्यक है। इस जगत में हम इस प्रकार फंस गए हैं कि अपना मूल रूप भूलकर निरंतर दु:खी बने हुए हैं। शारीरिक दुर्बलता को उत्तम भोजन, औषधि और विश्राम से दूर कर सकते हैं किंतु मानसिक दुर्बलता के निवारण के लिए स्वाभाविक बल को पहचानना होगा। ईश्वर की अनंत शक्ति और उनसे अपने संबंध को स्थापित कर उसका अनुभव करना होगा। अनेक सांसारिक बाधाओं के होते हुए भी हमें आत्मानुभव तो करना ही होगा।