PAYAR KA EK AAISHA AFSANA JO PYAR KE PICHE BHAGTA RAHA PAR PYAR USE DUTKARTA RAHA EK INSAN KA DARDA PESH KAR RAHA HOO EN RACHNAWO KE JARIYE
सोमवार, 13 दिसंबर 2010
जीवन में दौलत का बढ़ता चलन
काफी समय बाद आपके बिच में हूँ उसके लिए दिल से छमा प्रार्थी हूँ परन्तु इस बीच मै कुछ आइसी बातो में व्यस्त था की आप के बीच आने का समय नहीं मिल पाया इस बीच मैंने लिखा तो बहुत कुछ है पर उसे पेश करने से पहले आपकी राय जानने का मुझे हक़ है एक लड़की है जो दौलत की गुडिया है उसे अपने पैसे और पढाई का इतना घमंड है की वो अपने पति को अपना नहीं मानती वो रिश्तोके बंधन को ठुकराती है क्या ये सही है यदि ये सही है तो आपका ये दोस्त आगे कुछ भी लिख नहीं पायगा आपके जवाब में मै कुछ लाइन पेश करता हूँ /
जमी पर जब भी कभी जरुरत होगी हमको पुकार लेना
दौलत और हुस्न का क्या एतबार करना ये तो समय के साथ घट जायगी
हम तो गहने है जो दिल में सजाये जाते है ,
हमारी कीमत किसी के बाप की दौलत से ना लगा लेना
प्यार तो केवल समर्पण चाहता है ये कब दौलत से खुश हुवा है ,
जिसने भी प्यार को कभी छला है वो कभी न खुश रहा हैं /
राहुल मिश्र
बुधवार, 19 मई 2010
पर शाम को डूब जावोगे
साथियों एक बार फिर हाज़िर हूँ आपके बीच ...
हम तेरी मोहब्बत का यु जश्न मनाते है
एक चिराग जलाते है , एक चिराग बुझाते है
क्या अजीब आदत है इस शहर के बौनों की
खुद तो बढ़ नहीं सकते कद मेरा घटाते है
कद अपना जमीं से कितना उठावोगे
मै आसमा हूँ मुझको कभी छु ना पावोगे
इस तेज़ रोशनी पर इतना घमंड क्यों ?
सूरज हो ये सच है पर शाम होते ही डूब जावोगे
सोमवार, 17 मई 2010
इल्जाम
सपना मेरा बिखर ना जाये कही , झोली काटो से भर ना जाये कही
टूट जाये ना सपना चाहत का , मेरा नशा उतर न जाये कही
उलझाने इतनी पाल राखी है , दर्द दिल में न फ़ैल जाये कही
इतने अपनेपन से मत देखो ,कही जिंदगी गुजर न जाये मेरी
खा रही है ये फिक्र दुनिया को , मेरी दुनिया स्वर न जाये कही
ये आपके होतो की ख़ामोशी ,आप पर इल्जाम लगा न जाये कही
राहुल मिश्र
कुछ बाते
दर्द गैरो को सुनाने की जरुरत क्या है ,अपने साथ औरो को रुलाने की जरुरत क्या है ?
वकत यु ही कम है दोस्ती और प्यार के लिए , रूठकर वकत गवाने की जरुरत क्या है ?
तिरंगा जुल्म के खिलाफ लहराया जाये ,सच जो है सबको बताया जाये
रौनक उनके बगैर ना होगी राहुल ,इसलिए इस महफ़िल में उनको भी बुलाया जाये /
रविवार, 16 मई 2010
एक कविता आज के दौर की
दोस्तों ,
सहयोग के लिए धन्यवाद ,काफी समय से आप के बिच कुछ ला नहीं पाया उसके लिए दिल से दुखी हूँ /
मेरा लक्ष्य रहा है की मै आप सबको दिल के उन जज्बातों से रूबरू कराऊँ जो इन्सान के सीने में एक आग बनकर धधकती है /और वो आग धुवा बनकर आखो के रस्ते आशु बनकर निकल जाती है , मेरे
कहने का आभिप्राय मात्र इतना है की हर इन्शान के अन्दर एक कलाकार है बस जरुरत है तो उस कलाकार को खोज कर बाहर निकालने की ............
शब्द कही से बनाकर लाये नहीं जाते ये दिल की वो आवाज होते है जो हमारे बिच से ही निकलकर हमारे तन मन को झुमने के लिए मजबूर कर देते है /आज मै आपके बीच कोई कविता गजल तो नहीं रखा रहा हूँ / पर एक बात जरुर बता रहा हूँ किसी से दोस्ती करने के पहले ये जरुर याद रखना की आप जिस शख्स से दोस्ती कर रहे है वो आप के दिल के जज्बात को समझता भी है य़ा नहीं , और जिस के लिए आप अपना सब कुछ वार दे रहे है वो आपके बारे में क्या सोचता है मेरा वादा है दोस्त की यदि आपने
इन सुझावों पर ध्यान दिया तो आप दुशरे राहुल मिश्र नहीं बनेगे ......
" बादलो की वोट से जब चंदा निकालता है , दिल एक परिंदे सा उड़ने को मचलता है
आखो से आसू ऐसे भी निकलता है , जैसे कोई परदेसी घर छोड़ा के चलता है /
मिटटी के खिलोने को देखते है नफरत से ,आज का बछा भी पिस्टल से बहलता है
इन ठंडी हवावो का ये दोस्त भरोसा क्या ,इस शहर का मौसम तो पल पल में बदलता है/
हम जैसो को भला समझा है कोई ,रेगिस्तान से बाadal भी बच बच के निकलता है
हमें अपना प्यार भरा जवाब देना मत्त भूलियेगा
राहुल
सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
एक रचना किसी खास को
कुछ शिकायते है तो कुछ इशारे है
हमसे पूछो बहारो के जलवे ये दोस्त हमने तो तंगहाली में दिन गुजारे है /
तुम ज़माने के हो हमारे सिवा ,
हम किसी के नहीं बस तुम्हारे है /
हमसे जिन्दा थी जिंदगी कल तक ,
पर आज तो हम ही जिंदगी के मारे है /
जब नज़ारे न थे तब निगाहे वहा थी
अब निगाहे नहीं बस नज़ारे है ,
जिनको आसू समझ रहे हो आप
वो तो दिल के टूटे हुए सहारे है /
राहुल मिश्र
आपके विचारो का हमें इंतजार रहेगा /
rahulmishra3@in.com
rahul.mishra2009@indiatimes.com
कोई ठिकाना तो है नहीं
कहता है जल की मेरा तो ठिकाना है नहीं
अब कह दिया तो साथ निभाएंगे उम्र भर
हलाकि दोस्ती का अब जमाना तो है नहीं
थोड़ी सी आत्मविश्वास की रोशनी इसे जो भी लूट ले
वैसे भी मेरे पास कोई खजाना तो है नहीं
चुभ जाये जाने किसे ये बाते हमारी , पर अपना तो कोई खास निशाना है नहीं
राहुल मिश्र
आप हमें मेल करना न भूले अपने विचार
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शुक्रवार, 1 जनवरी 2010
नव वर्ष की शुभ कामना
