हमें सत्यनिष्ठ बनना है। हमारा स्वरूप यही है। असत्य और अज्ञान तो हमने
स्वयं ओढ़ रखा है और इसी कारण से हम दुर्बल हो गए हैं। सतत संघर्ष ही जीवन
पथ का पाथेय है। जो संघर्ष से डरते हैं वे ही कमजोर होते हैं। संघर्ष का पथ
अपनाने वाले हमेशा वीर होते हैं और विजयी होते हैं। जीवन का कष्ट भागने से
नहीं, सामना करने से भाग जाता है। इसके लिए आत्मशक्ति की पहचान आवश्यक है।
इस जगत में हम इस प्रकार फंस गए हैं कि अपना मूल रूप भूलकर निरंतर दु:खी
बने हुए हैं। शारीरिक दुर्बलता को उत्तम भोजन, औषधि और विश्राम से दूर कर
सकते हैं किंतु मानसिक दुर्बलता के निवारण के लिए स्वाभाविक बल को पहचानना
होगा। ईश्वर की अनंत शक्ति और उनसे अपने संबंध को स्थापित कर उसका अनुभव
करना होगा। अनेक सांसारिक बाधाओं के होते हुए भी हमें आत्मानुभव तो करना ही
होगा।
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