दोस्तों कुछ नयी पक्ति के साथ एक बार फिर हाज़िर हूँ आपके पास
" नयी सदी है मगर लोग तो पुराने है , सभल सभल के हमें फासले मिटाने है /
कही नमाज तो कही शंख भी है हवावो में हमें पता है ईश्वर के कई ठिकाने है
उजाले सिर्फ बड़ी घरो की अमानत न बने , कुछ इस तरह से हमें अब दिए जलाने है /
ना पसंद आई हमें दोस्ती पडोसी की , हमें तो अपने हर सफ़र के निशान मिटाने है /
आप की ख्याल के जुगनू तलाश करता हूँ ,सुनहरी रात के मुझे अहसान नहीं उठाने है
हर एक साल में हम केवल गले ही मिलते रहे , नए साल में अब हमें दिल से दिल मिलाने है /
राहुल मिश्र की कलम से
हमेशा की तरह आप की बेबाक राय के इंतजार में
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