सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

एक रचना किसी खास को

अक्स फितरत ने जो उभारे है
कुछ शिकायते है तो कुछ इशारे है
हमसे पूछो बहारो के जलवे ये दोस्त हमने तो तंगहाली में दिन गुजारे है /
तुम ज़माने के हो हमारे सिवा ,
हम किसी के नहीं बस तुम्हारे है /
हमसे जिन्दा थी जिंदगी कल तक ,
पर आज तो हम ही जिंदगी के मारे है /
जब नज़ारे न थे तब निगाहे वहा थी
अब निगाहे नहीं बस नज़ारे है ,
जिनको आसू समझ रहे हो आप
वो तो दिल के टूटे हुए सहारे है /

राहुल मिश्र
आपके विचारो का हमें इंतजार रहेगा /
rahulmishra3@in.com
rahul.mishra2009@indiatimes.com

3 टिप्‍पणियां:

  1. अक्स फितरत ने जो उभारे है
    कुछ शिकायते है तो कुछ इशारे है
    हमसे पूछो बहारो के जलवे ये दोस्त हमने तो तंगहाली में दिन गुजारे है..
    Bahut khoob!

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  2. अच्‍छी लगी आपकी रचना .. इस नए चिट्ठे के साथ हिन्‍दी चिट्ठा जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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