रविवार, 16 मई 2010

एक कविता आज के दौर की

दोस्तों ,

सहयोग के लिए धन्यवाद ,काफी समय से आप के बिच कुछ ला नहीं पाया उसके लिए दिल से दुखी हूँ /

मेरा लक्ष्य रहा है की मै आप सबको दिल के उन जज्बातों से रूबरू कराऊँ जो इन्सान के सीने में एक आग बनकर धधकती है /और वो आग धुवा बनकर आखो के रस्ते आशु बनकर निकल जाती है , मेरे

कहने का आभिप्राय मात्र इतना है की हर इन्शान के अन्दर एक कलाकार है बस जरुरत है तो उस कलाकार को खोज कर बाहर निकालने की ............

शब्द कही से बनाकर लाये नहीं जाते ये दिल की वो आवाज होते है जो हमारे बिच से ही निकलकर हमारे तन मन को झुमने के लिए मजबूर कर देते है /आज मै आपके बीच कोई कविता गजल तो नहीं रखा रहा हूँ / पर एक बात जरुर बता रहा हूँ किसी से दोस्ती करने के पहले ये जरुर याद रखना की आप जिस शख्स से दोस्ती कर रहे है वो आप के दिल के जज्बात को समझता भी है य़ा नहीं , और जिस के लिए आप अपना सब कुछ वार दे रहे है वो आपके बारे में क्या सोचता है मेरा वादा है दोस्त की यदि आपने

इन सुझावों पर ध्यान दिया तो आप दुशरे राहुल मिश्र नहीं बनेगे ......

" बादलो की वोट से जब चंदा निकालता है , दिल एक परिंदे सा उड़ने को मचलता है

आखो से आसू ऐसे भी निकलता है , जैसे कोई परदेसी घर छोड़ा के चलता है /

मिटटी के खिलोने को देखते है नफरत से ,आज का बछा भी पिस्टल से बहलता है

इन ठंडी हवावो का ये दोस्त भरोसा क्या ,इस शहर का मौसम तो पल पल में बदलता है/

हम जैसो को भला समझा है कोई ,रेगिस्तान से बाadal भी बच बच के निकलता है

हमें अपना प्यार भरा जवाब देना मत्त भूलियेगा

राहुल

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